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गीता प्रेस, गोरखपुर >> महाभारत के कुछ आदर्श पात्र

महाभारत के कुछ आदर्श पात्र

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1076
आईएसबीएन :81-293-0428-7

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प्रस्तुत है महाभारत के कुछ आदर्श पात्र...

Mahabharat Ke Kuch Adarsh Patra a hindi book by Jaidayal Goyandaka - महाभारत के कुछ आदर्श पात्र - जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

‘महाभारत में श्रीकृष्ण’ शीर्षक लेख के लेखक हैं श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार और ‘महाभारत के कुछ आदर्श पात्र’ नामक लेख श्रीजयदयालजी गोयन्दका द्वारा लिखित है।
दोनों लेखों में महाभारत के दस उत्कृष्ट पात्रों के जीवनकी आदर्श महत्त्वपूर्ण और उपदेशप्रद घटनाएँ हैं।
आशा है कि पाठकगण इनमें यथासम्भव लाभ उठाने का प्रयत्न करेंगे।–

प्रकाशक

श्रीहरिः

1 महाभारत में श्रीकृष्ण

श्रीकृष्णके सम्बन्ध में आजकल अनेकों प्रकारकी मनमानी कल्पनाएं की जाती हैं। कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण ऐतिहासिक पुरुष नहीं थे। कोई कहते हैं कि श्रीकृष्णनाम के व्यक्ति कुछ हजार वर्ष हुए हैं, परन्तु वे केवल एक लोकोत्तर मानव थे। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का जो स्वरूप मिलता है, वह तो विशुद्ध ज्ञान है। वैसे कोई व्यक्ति जगत् में नहीं हुए। कुछ लोगों का कहना है कि श्रीकृष्ण नाम के अनेक व्यक्ति हो चुके हैं-भागवत के श्रीकृष्ण अलग थे और महाभारत के अलग। यही नहीं कुछ तो यहाँ तक  कह बैठते हैं कि वृन्दावन के  श्रीकृष्ण और थे, मथुरा के और तथा द्वारका के श्रीकृष्ण तीसरे ही थे। प्रस्तुत लेखमें महाभारत के आधार पर यह दिखलानेकी चेष्टा की जायेगी कि महाभारत और भागवत के श्रीकृष्ण एक ही थे और वे पूर्णतम पुरुषोत्तम थे। गीता में उन्होंने जो अपना स्वरूप बतलाया है, वही उनका वास्तविक स्वरूप है और महाभारत के विभिन्न स्थलों से इसी बात की पुष्टि होती है।



1


जगन्नियन्ता, देवाधिदेव, अखिललोकपति भगवान् नारायण ही वासुदेव श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे, भागवतकी भाँति महाभारत ने भी इस बात को स्वीकार किया है। (देखिये आदिपर्व, अध्याय 64)। धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में बड़े-बड़े महर्षियों के साथ देवर्षि नारद भी यज्ञकी शोभाको देखने के लिये पधारते हैं। अन्यान्य राजाओं के साथ भगवान् श्रीकृष्णको सभामण्डपमें उपस्थित देखकर उन्हें भगवान् नारायणके भूमण्डलपर अवतीर्ण होने की बात स्मरण हो आती है।

(सभा० 36 । 12) और वे मन–ही-मन पुण्डरीकाक्ष  श्रीहरिका चिन्तन करने लगते हैं। इसके बाद सभा में जब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि आगन्तुक महानुभावों में सर्वप्रथम किस की पूजा की जाय, उस समय कुरुकुल वृद्ध वीरशिरोमणि महात्मा भीष्म यह कहते हुए कि ‘मैं तो भूमण्डल भर में श्रीकृष्ण को ही प्रथम पूजने के योग्य समझता हूँ,’ भरी सभामें उनकी महिमा का बखान करने लगते हैं। वे कहते हैं- ‘वासुदेव ही इस चराचर विश्व उत्पत्ति एवं प्रलयस्वरूप हैं और इस चराचर प्राणिजगत का अस्तित्व उन्हीं के लिये है। वासुदेव ही अव्यक्त प्रकृति सनातन कर्ता और समस्त प्राणियों के अधीश्वर अतएव परम पूजनीय हैं।’* देवर्षि नारदजी भी इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं (सभा० 39 । 8)। यही नहीं, इस प्रस्तावका अनुमोदन करने वाले सहदेव पर देवता लोग आकाश से पुष्पवृष्टि करते हैं और आकाशवाणी भी ‘साधु’ कहकर उनकी सराहना करती है।*

श्रीकृष्ण के बालचरित्रों का वर्णन साक्षातरूप से महाभारत में नहीं मिलता। इसका कारण यही है कि उन चरित्रों का महाभारत के मुख्य कथानकसे कोई सम्बन्ध नहीं है। अवश्य ही हरिवंश पर्व में, जो महाभारत का ही परिशिष्ट भाग है, इस कमीको पूरा किया गया है। फिर भी प्रसंगवश महाभारत के ही विभिन्न पात्रोंद्वारा श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का
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•    कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः।
कृष्णस्य हि कृते विश्नमिदं भूतं चराचरम्।।
एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः।
परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात पूज्यतमो हरिः।।


(सभा० 38 । 23  -24)


*ततोऽपतत् पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि।।
अदृश्यरूपा वाचाश्चाप्यब्रुवन् साधु साध्विति।।


(39    6-7)


यत्र-तत्र उल्लेख हुआ है। भीष्मपितामह के उपर्युक्त प्रस्तावका विरोध करते हुए चेदिराज शिशुपाल, जो श्रीकृष्ण का जन्म से ही विरोधी था और रुक्मिणी-हरण के बादसे तो उनसे और भी अधिक जलता था, बालकपन में क्रमशः उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वृषासुर और कंस के मारे जाने, शकट के गिराये जाने तथा गोवर्धन पर्वत के उठाये जाने आदिका उल्लेख करता है। (सभा. 41 । 4, 7-11) यद्यपि इन सब घटनाओं का उल्लेख उसने श्रीकृष्ण की निन्दा के तात्पर्य से ही किया है, फिर भी उसने इन सबकी सचाई को स्वीकार किया है।

शत्रुओं के द्वारा वर्णन किये हुए इन अलौकिक चरित्रों से श्रीकृष्ण की लोकोत्तरता तो प्रकट होती ही है; साथ ही जो लोग भागवतके श्रीकृष्ण को महाभारत के श्रीकृष्ण से भिन्न मानते हैं, उन्हें अपने मतपर पुनर्विचार करने के लिये पर्याप्त कारण भी मिल जाता है। अस्तु, इस प्रसंग पर शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को तथा उनकी प्रशंसा करनेवाले भीष्मपितामह को बहुत कुछ खोटी-खरी सुनायी। किन्तु श्रीकृष्ण वीरतापूर्वक उसके सारे अपराधों को सहते रहे। अन्त में जब उन्होंने देखा कि अन्य सभासदों के समझाने पर भी वह किसी प्रकार शान्त नहीं होता तब उन्होंने अपने सुदर्शनचक्र का स्मरण किया (सभा ० 45 । 21) और सबके देखते-देखते उस तीखी धारवाले चक्र से उसका सिर धड़से अलग कर दिया। उस समय सभा में उपस्थित सब लोगों ने देखा कि शिशुपालके शरीर से एक बड़ा भारी तेजका पुंज निकला और वह जगद्वन्द्य श्रीकृष्णको प्रणाम कर उन्हीं के शरीर में प्रवेश कर गया।* इस अलौकिक घटनासे
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•    ततश्चेदिपतेर्देहात्तेजोऽग्रयं ददृशुर्नृपाः
उत्पतन्तं महाराज गगनादि भास्करम्।
ततः कमलपत्राक्षं कृष्णं लोकनमस्कृतम्।
ववन्दे तत्तदा तेजो विवेश च नराधिप।।
तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः।
यद् विवेश महाबाहुं तत्तेजः पुरुषोत्तमम्।।

(सभा. 45 । 26-28)&
श्रीकृष्ण की भगवत्ता तो प्रमाणित होती है, साथ ही जो लोग वहाँ उपस्थित थे, उन्हें इस बात का भी प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया कि चाहे कोई कैसा भी पापी क्यों न हो, भगवान के हाथ से मारे जानेपर उसकी सायुज्यमुक्ति हो जाती है, वह भगवान के स्वरूप में लीन हो जाता है। यही उनकी अनुपम दयालुता है। वे मारकर भी जीवका उद्धार ही करते हैं। फिर पाण्डवों का भाँति जो उनसे प्रेम करते हैं, उनके हाथों वे अपने को बेच दें- इसमें आश्चर्य ही क्या है !
दुष्ट दुःशासन के द्वारा अपमानित द्रोपदी जिस समय असहाय होकर श्रीकृष्ण को पुकारती है, उस समय वह उन्हें ‘गोपीजनवल्लभ’ ‘व्रजनाथ’ आदि नामों से स्मरण करती है।* इससे भी यही सिद्ध होता है कि वृन्दावन के श्रीकृ्ष्ण और द्रारकाके श्रीकृष्ण अलग-अलग व्यक्ति नहीं थे ! अस्तु दौपदी की उस करुण पुकारको सुनते ही करुणामय केशव द्वारका से दौड़े आते हैं और धर्म रूपसे उसके वस्त्रों में छिपकर द्रौपदी की लाज बचाते हैं (सभा० 67 । 45-49) । क्या किसी मानव के द्वारा दूरस्थित अपने भक्त की इस प्रकार अलौकिक ढंगसे रक्षा सम्भव है ?



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